Konsa Dharam Duniya Mai Sabse Bada Hai – (कोनसा धर्म दुनिया मे सबसे बड़ा है ?)

आओ, आज आपको सच से मिलवाऊं, कि कोनसा धर्म है दुनिया में सबसे बड़ा है।

जाने कितने ही लोगों ने इस सवाल पर बहस की, लड़ाई की, यहां तक कि खून भी बहाया, कि कोनसा धर्म सबसे बड़ा है। पर क्या कभी किसी ने रुककर यह सोचा कि धर्म आखिर था किसलिए? बहुत से लोगों को लगता है की धर्म ही सर्वोपरि है।  यही एक अंतिम लक्ष्य है जीवन का और बस यही ईश्वर का मूल है।

पर धर्म कभी मंजिल नहीं था, वह तो बस एक मार्ग था एक अच्छे इंसान की तरह जीने का सच्चाई, अच्छाई और करुणा से चलने का, अपने आप को भीतर से विकसित करने का।  यहां कोई धर्मो की प्रतियोगिता नहीं चल रही है जिसमें यह जानना है कि कौन सा धर्म सर्वश्रेष्ठ है और किसके हिसाब से इंसान को जीना चाहिए, बल्कि यह सब तो अलग-अलग जीवन शैलियों हैं, जिन सब का एक ही मकसद है कि कैसे इंसान अपने जीवन को बेहतर और सार्थक तरीके से जी सके।  लेकिन अफसोस  की बात ये है कि आज बहुत से लोग धर्म को ही मूल लक्ष्य समझ बैठे हैं और उसी के नाम पर आपस में लड़ते रहते हैं ।

मानव सभ्यता के हिसाब से धर्म की उत्पत्ति का मुख्य कारण था समाज में नैतिक नियम स्थापित करना और लोगों को एकजुट रखना ताकि वह किसी भी अनजान खतरे का सामना मिलकर कर सकें, ना कि आपस में लड़ने के लिए और अपनी श्रेष्ठता साबित करने के लिए।  धर्म तो बस हमारे सामाजिक विकास का हिस्सा था, ना कि हमारे जीवन का मूल उद्देश्य। 

विज्ञान कहता है कि इंसान की सहानुभूति और उसकी नैतिकता, उसके दिमाग में विकसित हुई सामाजिक क्षमताएं हैं जिनके विकास में धर्म एक सहायक ढांचे की तरह रहा है।  इसका मतलब विज्ञान ने भी यही मानना है कि धर्म सिर्फ आपके विकास में सहायक है ना कि आपके जीवन का मूल लक्ष्य या मूल उद्देश्य ।

तो धर्म के नाम पर खून बहाने वालों ने कौन सा ज्ञान सीखा है, जो मानव सभ्यता और विज्ञान से भी ऊपर हो गया है ? अपने-अपने धर्म को सबसे ऊंचा दिखाने के लिए इंसानियत का जनाजा निकालने वालों, तुम यह बात कैसे भूल जाते हो कि किसी भी धर्म ने कभी किसी की जान नहीं ली, बल्कि हर धर्म ने यही सिखाया है कि मिलजुल कर प्रेम से सेवा भाव से जीवन जीना चाहिए। तुम कैसे भूल जाते हो कि तुम्हारा यह जीवन तुम्हे धर्म के लिए नहीं मिला था बल्कि तुमने अपने जीवन में धर्म को अपनाया था, तो फिर धर्म किसी के भी जीवन से बड़ा कैसे हो सकता है?

आज दुनिया में 20 से भी अधिक प्रमुख धर्म है और सैकड़ो उप परंपराएं हैं। और हर धर्म एक ही बात सिखाता है कि अच्छे इंसान बनो, सबके साथ प्यार का बर्ताव करो, सब पर दया दिखाओ, किसी का बुरा मत करो, एक दूसरे की मदद करो और एक दूसरे के काम आते हुए जीवन गुजारो।   किसी भी युग के किसी भी महान संत उपदेशक या पैगंबर में से किसी ने कभी नहीं कहा कि केवल धर्म ही एक अंतिम लक्ष्य है या कोई एक धर्म सर्वश्रेष्ठ है, बल्कि सभी ने एक ही बात कही है अच्छा इंसान बनो सत्य और प्रेम में जियो और एक दूसरे की मदद करो। 

जब हर धर्म के महान संत उपदेशक या पैगंबर सभी एक ही बात बोलते हैं कि मिलजुल कर सेवा भाव वह प्रेम से जीवन बिताओ । तो फिर समस्या कहां है ? क्यों हम एक धर्म को बड़ा और दूसरे धर्म को छोटा बनाने के चक्कर में एक दूसरे का खून बहा रहे हैं ? सच बोलूं तो असली समस्या धर्म में है ही नहीं, समस्या तो बस उन लोगों में है जो धर्म के नाम पर अपनी दुकान चला रहे हैं और इंसान को ही इंसान का दुश्मन बना रहे हैं। 

कुछ लोगों को लग सकता है कि धर्म का मकसद सिर्फ भगवान ईश्वर या अल्लाह को पाना है।  पर वास्तव में ऐसा नहीं है, क्योंकि उस ईश्वर को पाने का रास्ता सिर्फ इंसानियत से होकर गुजरता है, ना कि धर्म के कायदे कानून से, क्योंकि ऊपर वाले के लिए धर्म नहीं इंसानियत मायने रखती है। अगर उस ईश्वर को धर्म से मतलब होता या उसने धर्म बनाया होता, तो वो इतने सारे अलग-अलग धर्म क्यों बनाता? बस एक ही धर्म बनाता, जो लोगों को उस तक पहुंचा सकता।  पर एक बात तो सच है कि एक दूसरे को नीचे दिखाने के चक्कर में अगर इंसानियत खो गई तो फिर ईश्वर  को तो किसी भी हाल में नहीं पा सकोगे।

अब फैसला तुम्हें करना है कि तुम धर्म को क्या मानते हो और कैसे जीते हो। हम वही लोग हैं जो मुसीबत पढ़ने पर अपनी जान की परवाह किए बिना दुसरो की जान बचाते हैं।  तो सिर्फ अपने धर्म को बड़ा दिखाने के लिए कैसे हम एक दूसरे का खून बहा सकते हैं ? हम लोग चाहे तो मिलकर एक ऐसी दुनिया बना सकते हैं जहां इंसानियत सबसे बड़ा धर्म हो, और लोग अपने आप को बड़ा दिखाने के लिए दूसरे को नीचा ना दिखाते हो।  एक ऐसी दुनिया जहां सब मिलकर रहे और एक दूसरे की मदद करते हुए प्रेम से अपना जीवन बिता सके।

स्वर्ग सच में होता है या नहीं इसका तो नहीं पता, पर अगर लोग चाहे तो इसी दुनिया को स्वर्ग बना सकते है।